माँसाहार के समय के और उससे पहले के कुछ दोषों का वर्णन अभी रह गया हैं। ये दोष विवाह से पहले का अथवा उसके तुरन्त बाद के हैं।

अपने एक रिश्तेदार के साथ मुझे बीडी पीने को शौक लगा। हमारे पास पैसे नहीं थे। हम दोनो में से किसी का यह ख्याल तो नहीं था कि बीड़ी पीने में कोई फायदा हैं, अथवा गन्ध मे आनन्द हैं। पर हमे लगा सिर्फ धुआँ उड़ाने में ही कुछ मजा हैं। मेरे काकाजी को बीड़ी पीने की आदत थी। उन्हें और दूसरो को धुआँ उड़ाते देखकर हमे भी बीड़ी फूकने की इच्छा हुई। गाँठ में पैसे तो थे नहीं, इसलिए काकाजी पीने के बाद बीड़ी के जो ठूँठ फैंक देके , हमने उन्हें चुराना शुरू किया।

पर बीड़ी के ये ठूँठ हर समय निल नहीं सकते थे , औऱ उनमें से बहुत धुआँ भी नहीं निकलता था। इसलिए नौकर की जेब में पड़े दो-चार पैसों में से हम ने एकाध पैसा चुराने की आदत डाली और हम बीड़ी खरीदने लगे। पर सवाल यह पैदा हुआ कि उसे संभाल कर रखें कहाँ। हम जानते थे कि बड़ो के देखते तो बीडी पी ही नहीं सकते। जैसे-तैसे दो-चार पैसे चुराकर कुछ हफ्ते काम चलाया। इसी बीच सुना एक प्रकार का पौधा होता हैं जिसके डंठल बीड़ी की तरप जलते हैं और फूँके जा सकते है। हमने उन्हें प्राप्त किया और फूँकने लगे !

पर हमें संतोष नहीं हुआ। अपनी पराधीनता हमें अखरने लगी। हमें दुःख इस बात का था कि बड़ों की आज्ञा के बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते थे। हम उब गये और हमने आत्महत्या करने का निश्चय कर किया !

पर आत्महत्या कैसे करें? जहर कौन दें? हमने सुना कि धतूरे के बीज खाने से मृत्यु होती हैं। हम जंगल में जाकर बीच ले आये। शाम का समय तय किया। केदारनाथजी के मन्दिर की दीपमाला में घी चढ़ाया , दर्शन कियें और एकान्त खोज लिया। पर जहर खाने की हिम्मत न हूई। अगर तुरन्त ही मृत्यु न हुई तो क्या होगा ? मरने से लाभ क्या ? क्यों न पराधीनता ही सह ली जाये ? फिक भी दो-चार बीज खाये। अधिक खाने की हिम्मत ही न पड़ी। दोनों मौत से डरे और यह निश्चय किया कि रामजी के मन्दिर जाकर दर्शन करके शान्त हो जाये और आत्महत्या की बात भूल जाये।

मेरी समझ में आया कि आत्महत्या का विचार करना सरल हैं , आत्महत्या करना सरल नहीं। इसलिए कोई आत्महत्या करने का धमकी देता हैं, तो मुझ पर उसका बहुत कम असर होता हैं अथवा यह कहना ठीक होगा कि कोई असर हो ही नहीं।

आत्महत्या के इस विचार का परिणाम यह हुआ कि हम दोनो जूठी बीड़ी चुराकर पीने की और नौकर के पैसे चुराकर पैसे बीड़ी खरीदने और फूँकने की आदत भूल गये। फिर कभी बड़ेपन में पीने की कभी इच्छा नहीं हुई। मैने हमेशा यह माना हैं कि यह आदत जंगली , गन्दी और हानिकारक हैं। दुनिया में बीड़ी का इतना जबरदस्त शौक क्यों हैं, इसे मैं कभी समझ नहीं सका हूँ। रेलगाड़ी के जिस डिब्बे में बहुत बीड़ी पी जाती हैं, वहाँ बैठना मेरे लिए मुश्किल हो जाता हैं औऱ धुँए से मेरा दम घुटने लगता हैं।

बीड़ी के ठूँठ चुराने और इसी सिलसिले में नोकर के पैसे चुराने की के दोष की तुलना में मुझसे चोरी का दूसरा जो दोष हुआ , उसे मैं अधिक गम्भीर मानता हूँ। बीड़ी के दोष के समय मेरी उमर बारह तेरह साल की रही होगी ; शायद इससे कम भी हो। दूसरी चोरी के समय मेरी उमर पन्द्रह साल की रही होगी। यह चोरी मेरे माँसाहारी भाई के सोने के कड़े के टुकड़े की थी। उन पर मामूली सा, लगभग पच्चीस रुपये का कर्ज हो गया था। उसकी अदायगी के बारे हम दोनो भाई सोच रहे थे। मेरे भाई के हाथ में सोने का ठोस कड़ा था। उसमें से एक तोला सोना काट लेना मुश्किल न था।


कड़ा कटा। कर्ज अदा हुआ। पर मेरे लिए यह बात असह्य हो गयी। मैने निश्चय किया कि आगे कभी चोरी करुँगा ही नहीं। मुझे लगा कि पिताजी के सम्मुख अपना दोष स्वीकार भी कर लेना चाहिये। पर जीभ न खुली। पिताजी स्वयं मुझे पीटेंगे , इसका डर तो था ही नहीं। मुझे याद नहीं पड़ता कभी हममें से किसी भाई को पीटा हो। पर खुद दुःखी होगे, शायद सिर फोड़ लें। मैने सोचा कि यह जोखिम उठाकर भी दोष कबूल कर लेना चाहिये , उसके बिना शुद्धि नहीं होगी।

आखिर मैने तय किया कि चिट्ठी लिख कर दोष स्वीकार किया जाये और क्षमा माँग ली जाये। मैंने चिट्ठी लिखकर हाथोहाथ दी। चिट्ठी में सारा दोष स्वीकार किया और सजा चाही। आग्रहपूर्वक बिनती की कि वे अपने को दुःख में न डाले और भविष्य मे फिर ऐसा अपराध न करने की प्रतिज्ञा की।

मैंने काँपते हाथों चिट्ठी पिताजी के हाथ में दी। मैं उनके तखत के सामने बैठ गया। उन दिनों वे भगन्दर की बीमारी से पीड़ित थे , इस कारण बिस्तर पर ही पड़े रहते थे। खटिया के बदले लकड़ी का तख्त काम में लाते थे।

उन्होंने चिट्ठी पढ़ी। आँखों से मोती की बूँदे टपकी। चिट्ठी भीग गयी। उन्होंने क्षण भर के आँखें मूंदी , चिट्ठी फाड़ डाली और स्वयं पढ़ने के लिए उठ बैठे थे, सो वापस लौट गये।

मैं भी रोया। पिताजी का दुःख समझ सका। अगर मैं चित्रकार होता, तो वह चित्र आज भी सम्पूर्णता से खींच सकता। आज भी वह मेरी आँखो के सामने इतना स्पष्ट हैं।

मोती की बूँदों के उस प्रेमबाण ने मुझे बेध डाला। मैं शुद्ध बना। इस प्रेम को तो अनुभवी ही जान सकता हैं।

रामबाण वाग्यां रे होय ते जाणे।

(राम की भक्ति का बाण जिसे लगा हो वही जान सकता हैं।)

मेरे लिए यह अंहिसा का पदार्थपाठ था। उस समय तो मैंने इसमें पिता के प्रेम के सिवा और कुछ नहीं देखा , पर आज मैं इसे शुद्ध अंहिसा के नाम से पहचान सकता हूँ। ऐसी अंहिसा के व्यापक रुप धारण कर लेने पर उसके स्पर्श से कौन बच सकता हैं ? ऐसी व्यापक अंहिसा की शक्ति की थाह लेना असम्भव हैं।

इस प्रकार की शान्त क्षमा पिताजी के स्वभाव के विरुद्ध थी। मैने सोचा था कि वे क्रोध करेंगे, शायद अपना सिर पीट लेंगे। पर उन्होंने इतनी अपार शान्ति जो धारण की , मेरे विचार उसका कारण अपराध की सरल स्वीकृति थी। जो मनुष्य अधिकारी के सम्मुख स्वेच्छा से और निष्कपट भाव से अपराध स्वीकार कर लेता हैं और फिर कभी वैसा अपराध न करने की प्रतिज्ञा करता हैं, वह शुद्धतम प्रायश्चित करता हैं।

मैं जानता हूँ कि मेरी इस स्वीकृति से पिताजी मेरे विषय मे निर्भय बने और उनका महान प्रेम और भी बढ़ गया।

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