मेरे जीवन मे ऐसी घटनाये घटती ही रही हैं जिसके कारण मैं अनेक धर्मावलम्बियों के और अनेक जातियों के गाढ़ परिचय मे आ सका हूँ। इन सब के अनुभवों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि मैने अपने और पराये , देशी और विदेशी, गोरे और काले, हिन्दू और मुसलमान अथवा ईसाई , पारसी यहूदी के बीच कोई भेद नहीं किया। मै कह सकता हूँ कि मेरा हृदय ऐसे भेद को पहचान ही न सका। अपने सम्बन्ध में मै इस चीज को गुण नही मानता , क्योकि जिस प्रकार अहिंसा, ब्रह्मचर्य , अपरिग्रह आदि यमों की सिद्धि का प्रयत्न करने का और उस प्रयत्न के अब तक चलने का मुझे पूरा भान है, उसी प्रकार मुझे याद नही पड़ता कि ऐसे अभेद को सिद्ध करने का मैने विशेष प्रयत्न किया हो।

जब मै डरबन मे वकालत करता था, तब अकसर मेरे मुहर्रिर मेरे साथ रहते थे। उनमे हिन्दू और ईसाई थे अथवा प्रान्त की दृष्टि से कहूँ तो गुजराती औऱ मद्रासी थी। मुझे स्मरण नही हैं कि उनके बारे मे मेरे मन मे कभी भेदभाव पैदा हुआ हो। मैं उन्हें अपना कुटुम्बी मानता था औऱ यदि पत्नी की ओर से इसमे कोई बाधा आती तो मै उससे लड़ता था। एक मुहर्रिर ईसाई था। उसके माता-पिता पंचम जाति के थे। हमारे घर की बनाबट पश्चिम ढब की थी। उसमें कमरों के अन्दर मोरियाँ नहीं होती -- मै मानता हूँ कि होनी भी नही चाहिये -- इससे हरएक कमरे मे मोरी की जगह पेशाब के लिए खास बरतन रखा जाता हैं। उसे उठाने का काम नौकर का न था , बल्कि हम पति-पत्नी का था। जो मुहर्रिर अपने को घर का-सा मानने लगते , वे तो अपने बरतन खुद उठाते भी थे। यह पंचम कुल में उत्पन्न मुहर्रिर नया था। उसका बरतन हमें ही उठाना चाहियें था। कस्तूरबाई दूसरे बरतन चो उठाती थी , पर इस बरतन को उठाना उसे असह्य लगा। इससे हमारे बीच कलह हुआ। मेरा उठाना उससे सहा न जाता था और खुद उठाना उसे भारी हो गया। आँखो से मोती को बूँदे टपकाती, हाथ में बरतन उठाती और अपनी लाल आँखो से मुझे उलाहना देकर सीढियाँ उतरती हुई कस्तूरबाई का चित्र मै आज भी खींच सकता हूँ।

पर मै तो जितना प्रेमी उतना ही क्रूर पति था। मैं अपने को उसका शिक्षक भी मानता था , इस कारण अपने अंधे प्रेम के वश होकर उसे खूब सताता था।

यों उसके सिर्फ बरतन उठाकर ले जाने से मुझे संतोष न हुआ। मुझे संतोष तभी होता जब वह उसे हँसते मुँह ले जाती। इसलिए मैने दो बातें ऊँची आवाज मे कहीं। मैं बड़बड़ा उठा, 'यह कलह मेरे घर मे नहीं चलेगा।'

यह वचन कस्तूरबाई को तीर की तरह चुभ गया।

वह भडक उठी , 'तो अपना घर अपने पास रखो। मै यह चली।'

मैं उस समय भगवान को भूल बैठा था। मुझमे दया का लेश भू नहीं रह गया था। मैने उसका हाथ पकड़ा। सीढ़ियों के सामने ही बाहर निकलने का दरवाजा था। मैं उस असहाय अबला को पकड़कर दरवाजे तक खींच ले गया। दरवाजा आधा खोला।

कस्तूरबाई की आँखो से गंगा-यमुना बह रहीं थी। वह बोली , 'तुम्हें तो शरम नही हैं। लेकिन मुझे हैं। मैं बाहर निकलकर कहाँ जा सकती हूँ ? यहाँ मेरे माँ-बाप नहीं हैं कि उनके घर चली जाऊँ। मै तुम्हारी पत्नी हूँ इसलिए मुझे तुम्हारी डाँट-फटकार सहनी ही होगी। अब शरमाओ और दरवाजा बन्द करो। कोई देखेगा तो दो मे से एक की भी शोभा नहीं रहेगी।'

मैने मुँह तो लाल रखा , पर शरमिंदा जरूर हुआ। दरवाजा बन्द कर दिया। यदि पत्नी मुझे छोड़ नही सकती थी, तो मै भी उसे छोड़कर कहाँ जा सकता था ? हमारे बीच झगडे तो बहुत हुए हैं , पर परिणाम सदा शूभ ही रहा हैं। पत्नी ने अपनी अद्भुत सहनशक्ति द्वारा विजय प्राप्त की हैं।

मैं यह वर्णन आज तटस्थ भाव से कर सकता हूँ , क्योकि यह घटना हमारे बीते युग की हैं। आज मैं मोहान्ध पति नहीं हूँ। शिक्षक नहीं हूँ। कस्तूरबाई चाहे तो मुझे आज घमका सकती हैं। आज हम परखे हुए मित्र हैं , एक दूसरे के प्रति निर्विकार बनकर रहते हैं। कस्तूरबाई आज मेरी बीमारी मे किसी बदले की इच्छा रखे बिना मेरी चाकरी करनेवाली सेविका हैं।

ऊपर की घटना सन् 1898 की हैं। उस समय मैं ब्रह्मचर्य पालन के विषय मे कुछ भी न जानता था। यह वह समय था जब मुझे इसका स्पष्ट भान न था कि पत्नी केवल सहधर्मिणी, सह चारिणी और सुख दुःख की साथिन हैं। मै यह मानकर चलता था कि पत्नी विषय-भोग का भाजन हैं , और पति की कैसी भी आज्ञा क्यो न हो, उसका पालन करने के लिए वह सिरजी गयी है।

सन् 1900 मे मेरे विचारो मे गंभीर परिवर्तन हुआ। उसकी परिणति सन् 1906 मे हुई। पर इसकी चर्चा हम यथास्थान करेंगे।

यहाँ तो इतना कहना काफी हैं कि जैसे-जैसे मैं निर्विकार बनता गया , वैसे-वैसे मेरी गृहस्थी शान्त, निर्मल और सुखी होती जा रहीं हैं।

इस पुण्यस्मरण से कोई यह न समझ ले कि हम दोनों आदर्श पति-पत्नी हैं , अथवा मेरी पत्नी मे कोई दोष ही नही हैं या कि अब तो हमारे आदर्श एक ही हैं। कस्तूरबाई के अपने स्वतंत्र आदर्श हैं या नहीं सो वह बेचारी भी नहीं जानती होगी। संभव है कि मेरे बहुतेरे आचरण उसे आज भी अच्छे न लगते हो। इसके सम्बन्ध मे हम कभी चर्चा नहीं करते , करने मे कोई सार नहीं। उसे न तो उसके माता पिता ने शिक्षा दी और न जब समय था तब मैं दे सका। पर उसमे एक गुण बहुत ही बड़ी मात्रा में हैं , जो बहुत सी हिन्दू स्त्रियों मे न्यूनाधिक मात्रा मे रहता है। इच्छा से हो चाहे अनिच्छा से, ज्ञान से हो या अज्ञान से, उसने मेरे पीछे-पीछे चलने मे अपने जीवन की सार्थकता समझी हैं और स्वच्छ जीवन बिताने के मेरे प्रयत्न मे मुझे कभी रोका नही हैं। इस कारण यद्यपि हमारी बुद्धि शक्ति मे बहुत अन्तर है, फिर भी मैने अनुभव किया है कि हमारा जीवन संतोषी , सुखी और ऊर्ध्वगामी हैं।

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