अब ब्रह्मचर्य के विषय मे विचार करने का समय आ गया हैं। एक पत्नी व्रत का तो विवाह के समय से ही मेरे हृदय मे स्थान था। पत्नी के प्रति वफादारी मेरे सत्यव्रत का अंग था। पर अपनी स्त्री के साथ भी ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये , इसका स्पष्ट बोध मुझे दक्षिण अफ्रीका मे ही हुआ। किस प्रसंग से अथवा किस पुस्तक के प्रभाव से यह विचार मेरे मन मे उत्पन्न हुआ , यो तो आज मुझे स्पष्ट याद नही हैं कि इसमे रायचंदभाई के प्रभाव की प्रधानता थी।

उनके साथ के संवाद का मुझे स्मरण हैं। एक बार मैं ग्लैडस्टन के प्रति मिसेज ग्लैडस्टन के प्रेम की प्रशंसा कर रहा था। मैने कहीं पढ़ा था कि पार्लियामेंट की सभा मे भी मिसेज ग्लैडस्टन अपने पति को चाय बनाकर पिलाती थी। इस वस्तु का पालन इस नियमबद्ध दम्पती के जीवन का एक नियम बन गया था। मैने कवि को यह प्रसंग पढ़कर सुनाया और उसके सन्दर्भ में दम्पती प्रेम की स्तुति की। रायचन्दभाई बोले, 'इसमे तुम्हे महत्त्व की कौन सी बात मालूम होती हैं ? मिसेज ग्लैडस्टन का पत्नीत्व या उनका सेवाभाव? यदि वे ग्लैडस्टन की बहन होती तो ? अथवा उनकी वफादार नौकरानी होती और उतने ही प्रेम से चाय देती तो ? ऐसी बहनों, ऐसी नौकरानियों के दृष्टांत क्या हमे आज नही मिलते ? और नारी-जाति के बदले ऐसा प्रेम यदि तुमने नर-जाति मे देखा , तो क्या तुम्हे सानन्द आश्चर्य न होता ? तुम मेरे इस कथन पर विचार करना। '

रायचन्द भाई स्वयं विवाहित थे। याद पड़ता है कि उस समय तो मुझे उनके ये वचन कठोर लगे थे, पर इन वचनो ने मुझे चुम्बक की तरह पकड़ लिया। मुझे लगा कि पुरुष सेवक की ऐसी स्वामीभक्ति का मूल्य पत्नी की पति-निष्ठा के मूल्य से हजार गुना अधिक हैं। पति-पत्नी में ऐक्य होता हैं, इसलिए उनमे परस्पर प्रेम हो तो कोई आश्चर्य नही। मालिक और नौकर के बीच वैसा प्रेम प्रयत्न-पूर्वक विकसित करना होता हैं। दिन-पर-दिन कवि के वचनो का बल मेरी दृष्टि में बढता प्रतीत हुआ।

मैने अपने-आप से पूछा, मुझे अपनी पत्नी के साथ कैसा सम्बन्ध रखना चाहिये। पत्नी को विषय-भोग का वाहन बनाने मे पत्नी के प्रति वफादारी कहाँ रहती हैं ? जब तक मैं विषय-वासना के अधीन रहता हूँ, तब तक तो मेरी वफादारी का मूल्य साधारण ही माना जायगा। यहाँ मुझे यह कहना ही चाहिये कि हमारे आपस के सम्बन्ध मे पत्नी की ओर से कभी आक्रमण हुआ ही नहीं। इस दृष्टि से जब मैं चाहता तभी मेरे लिए ब्रह्मचर्य का पालन सुलभ था। मेरी अशक्ति अथवा आशक्ति ही मुझे रोक रही थी।

जाग्रत होने के बाद भी दो बार तो मै विफल ही रहा। प्रयत्न करता परन्तु गिर पड़ता। प्रयत्न में मुख्य उद्देश्य था, सन्तानोत्पत्ति को रोकना। उसके बाह्य उपचारो के बारे में मैने विलायत में कुछ पढ़ा था। डॉ. एलिन्सन के इन उपायो के प्रचार का उल्लेख मैं अन्नाहार-विषयक प्रकरण में कर चुका हूँ। उसका थोड़ा और क्षणिक प्रभाव मुझ पर पड़ा था। पर मि. हिल्स ने उसका जो विरोध किया था और आन्तरिक साधन के -- संयम के -- समर्थन में जो कहा था, उसका प्रभाव मुझ पर बहुत अधिक पड़ा और अनुभव से वह चिरस्थायी बन गया। इसलिए सन्तानोत्पत्ति की अनावश्यकता ध्यान मे आते ही मैने संयम-पालन का प्रयत्न शुरु कर दिया।

संयम पालन की कठिनाईयों का पार न था। हमने अलग खाटें रखी। रात में पूरी तरह थकने के बाद ही सोने का प्रयत्न किया। इस सारे प्रयत्न का विशेष परिणाम मै तुरन्त नही देख सका। पर आज भूतकाल पर निगाह डालते हुए देखता हूँ कि इन सब प्रयत्नो मे मुझे अंतिम निश्चय का बल दिया।

अंतिम निश्चय तो मैं सन् 1906 मे ही कर सका था। उस समय सत्याग्रह का आरम्भ नहीं हुआ था। मुझे उसका सपना तक नही आया था। बोअर-युद्ध के बाद नेटाल में जुलू 'विद्रोह' हुआ। उस समय मैं जोहानिस्बर्ग मे वकालत करता था। पर मैने अनुभव किया कि इस 'विद्रोह' के मौके पर भी मुझे अपनी सेवा नेटाल सरकार को अर्पण करनी चाहिये। मैने सेवा अर्पण की और वह स्वीकृत हुई। उसका वर्णन आगे आयेगा। पर इस सेवा के सिलसिले में मेरे मन मे संयम-पालन के तीव्र विचार उत्पन्न हुए। अपने स्वभाव के अनुसार मैने साथियों से इसकी चर्चा की। मैने अनुभव किया कि सन्तानोत्पत्ति और सन्तान का लालन-पालन सार्वजनिक सेवा के विरोधी हैं। इस 'विद्रोह' मे सम्मिलित होने के लिए मुझे जोहानिस्बर्ग की अपनी गृहस्थी उजाड़ देनी पड़ी थी। टीप-टाप से बसाये गये घर का और साज-समान का , जिसे बसाये मुश्किल से एक महीना हुआ होगा, मैने त्याग कर दिया। पत्नी और बच्चो को फीनिक्स मे रख दिया और मै डोली उठाने वालो की टुकड़ी लेकर निकल पड़ा। कठिन कूच करते हुए मैने देखा कि यदि मुझे लोकसेवा मे ही तन्मय हो जाना हो तो पुत्रैषणा और वितैषणा का त्याग करना चाहिये और वानप्रस्थ-धर्म पालना चाहिये।

'विद्रोह' मे तो मुझे डेढ महीने से अधिक का समय नही देना पड़ा , पर छह हफ्तो का यह समय मेरे जीवन का अत्यन्त मूल्यवान समय था। इस समय मैने व्रत के महत्त्व को अधिक से अधिक समझा। मैने देखा कि व्रत बन्धन नही, बल्कि स्वतंत्रता का द्बार हैं। आज तक मुझे अपने प्रयत्नों में चाहिये उतनी सफलता न मिलने का कारण यह था कि मों ढृढनिश्चयी नही था। मुझे अपनी शक्ति पर अविश्वास था, ईश्वर की कृपा पर अविश्वास था, और इस कारण मेरा मन अनेक तरंगो और अनेक विचारों के चक्कर में पड़ा रहता था। मैने देखा कि व्रत-बद्ध न होने से मनुष्य मोह में पड़ता हैं। व्रत से बंधना व्यभिचार से छुटकारा पाकर एकपत्नी व्रत का पालन करने के समान हैं। 'मैं प्रयत्न करने मे विश्वास रखता हूँ, व्रत से बन्धन नहीं चाहता ' - यह वचन निर्बलता की निशानी हैं, और इसमे सूक्ष्म रुप से भोग की वासना छिपी होती हैं। जो वस्तु त्याज्य हैं, उसका सर्वथा त्याग करने मे हानि कैसे हो सकती हैं ? जो साँप मुझे डंसने वाला है, उसका त्याग मै निश्चय-पूर्वक करता हूँ , त्याग का केवल प्रयत्न नही करता। मै जानता हूँ कि केवल प्रयत्न के भरोसे रहने मे मृत्यु निहित हैं। प्रयत्न मे साँप की विकरालता के स्पष्ट ज्ञान का अभाव हैं। इसी तरह हम केवल वस्तु के त्याग का हम केवल प्रयत्न करते है उस वस्तु के त्याग के औचित्य के बारे में हमे स्पष्ट दर्शन नही हुआ हैं , यह सिद्ध होता है। 'आगे चलकर मेरे विचार बदल जाये तो ?' ऐसी शंका करके प्रायः हम व्रत लेने से डरते हैं। इस विचार मे स्पष्ट दर्शन का अभाव ही हैं। इसीलिए निष्कुलानन्द ने कहा हैं :

'त्याग न टके रे वैराग बिना।'

जहाँ अमुक वस्तु के प्रति संपूर्ण वैराग्य उत्पन्न हो गया हैं, वहाँ उसके विषय मे व्रत लेना अनिवार्य हो जाता हैं।

Please join our telegram group for more such stories and updates.telegram channel

Books related to सत्य के प्रयोग


संभाजी महाराज - चरित्र (Chava)
मराठी बोधकथा  5
जातक कथासंग्रह
श्यामची आई
आस्तिक
बोध कथा
गांवाकडच्या गोष्टी
बाळशास्त्री जांभेकर
संत तुकाराम अभंग - संग्रह ३
सावित्रीबाई फुले
शिवचरित्र
हिमालयाची शिखरें
बुद्ध व बुद्धधर्म
श्रीएकनाथी भागवत
नलदमयंती