अच्छा, अब जरा ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करने का परिणाम क्या होता है, क्या होना चाहिए, इस पर भी गीता की दृष्टि देखें। गीता के सोलहवें अध्याय के शुरूवाले छह श्लोकों में दैवी तथा आसुरी संपत्तियों का संक्षेप में वर्णन कर दिया है। इन दोनों का तात्पर्य मनुष्य के ऐसे गुणों और आचरणों से है जिनसे समाज का हिताहित, भला-बुरा होता है। कल्याणकारी और मंगलमय गुणों एवं आचरणों को दैवी संपत्ति और विपरीतों को आसुरी संपत्ति कहा है। पाँचवें श्लोक में यही बात साफ कह दी है कि दैवी संपत्ति मुक्तिसंपादक और कल्याणकारी है, जब कि आसुरी सभी बंधनों और संकटों को पैदा करती है। साथ ही यह भी कहा है कि अर्जुन के लिए चिंता की तो कोई बात हई नहीं। क्योंकि वह तो दैवी संपत्तिवाला है। इसके बाद छठे श्लोक के उत्तरार्द्ध में कहा है कि अब तक तो दैव संपत्ति का ही विस्तृत विवेचन किया गया है। मगर आसुरी तो छूटी ही है। इसलिए उसे भी जरा खोल के बता दें तो ठीक हो। फिर सातवें से लेकर अध्याय के अंत तक के शेष 18 श्लोकों में यही बात लिखी गई है। बेशक, अंत के 22-24 श्लोकों में निषेध के रूप में ही यह बात कही गई है। शेष श्लोकों में साफ-साफ निरूपण ही है।

यहाँ जो यह कहा गया है कि अब तक तो विस्तार के साथ दैव संपत्ति का ही वर्णन आया है, उससे साफ हो जाता है कि गीता के शुरू से लेकर सोलहवें अध्याय के कुछ श्लोकों तक मुख्यत: वही बात कही गई है। यह तो निर्विवाद है कि पहले अध्याय में खुल के समाज-संहार की कड़ी से कड़ी निंदा की गई है। दूसरे में भी जो अर्जुन को यह कहा गया है कि लोग तुम्हें गालियाँ देंगे और तुम पर थूकेंगे वह भी सामाजिक दृष्टि से ही तो है। तीसरे अध्याय में तो समाज रक्षार्थ यज्ञ का विस्तार ही बताया गया है और कहा गया है कि समाज के लिए उसे मूलभूत मानना चाहिए। इसी प्रकार चौथे के 'नायं लोकोऽस्त्यज्ञस्य' (31) आदि के द्वारा तथा छठे के 'आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति' (32) के जरिए लोक-कल्याणकारी भावनाओं एवं आचरणों का ही महत्त्व दिखाया है। सातवें से लेकर पंदरहवें अध्याय तक यही बात जगह-जगह किसी न किसी रूप में बराबर पाई जाती है। इसलिए स्पष्ट है कि समाज के कल्याण से ही गीता का मतलब है। यों तो योग का जो स्वरूप पहले बताया जा चुका है वह समाज के कल्याण की ही चीज है। दसवें अध्याय के अंत के 41वें श्लोक में तो साफ ही कह दिया है कि संसार में जोई चमत्कार वाली गुणयुक्त चीज है वह भगवान का ही रूप है, उसी का अंश है। इससे तो स्पष्ट है कि गीता की दृष्टि में भगवान का मतलब ही है जगन्मंगलकर्त्ता से। गीता वैसे भगवान को कहाँ देखती और मानती है जो केवल स्वर्ग और नरक में भेजने का इंतजाम करता हो, या मुक्ति देता हो? गीता ने तो ऐसे भगवान का खयाल ही नहीं किया है।

यही बात सोलहवें अध्याय के 7-24 श्लोकों से भी सिद्ध होती है। आमतौर से यही होता है, यही बात देखी जाती है कि जो कुकर्मों को करता हुआ ईश्वर की सत्ता में विश्वास नहीं करता हो उसकी निंदा या उसके खंडन-मंडन का जब प्रसंग आए तो इसी बात से शुरू करते हैं कि देखिए न, यह तो ईश्वर को ही नहीं मानता है और साफ ही कहता है कि इस सृष्टि की उत्पत्ति या इसके काम के संचालन के लिए उसकी जरूरत हई नहीं! फिर और लोगों की इसे क्या परवाह होगी? उनके हितों को क्यों न पाँव तले रौंदेगा? आदि-आदि। ठीक भी यही प्रतीत होता है और स्वाभाविक भी। भगवान तो लोगों के लिए सबसे बड़ी चीज है और जो उसे ही नहीं मानता वह बाकी को क्यों मानने लगा? लोगों का गुस्सा भी यदि उस पर उतरेगा तो यही कहके कि जब यह शालिग्राम को ही भून देता है तो इसे बैंगन भूनने में क्या देर? अंत में भी सब कुछ लानत-मलामत के बाद यही कहेंगे कि इसकी ऐसी हिम्मत कि भगवान तक को भी इनकार कर जाए?

मगर गीता में कुछ और ही देखते हैं। वहाँ तो असुरों का लक्षण बताते हुए पूरे सातवें श्लोक में ईश्वर का नाम ही नहीं आया है। आसुर-संपत्ति वाले इस संसार के मूल में ईश्वर को नहीं मानते यह बात सिर्फ आठवें श्लोक के पूर्वार्द्ध के अंत में यों पाई जाती है कि देखो न, ये लोग संसार के मूल में उसे नहीं मानते - 'जगदाहुरनीश्वरम्'। इसके पहले सातवें में तो यही कहा है कि 'असुर लोग तो क्या करें क्या न करें यह - कर्तव्याकर्तव्य - जानते ही नहीं, उनमें पवित्रता भी नहीं होती और न उनका आचरण ही ठीक होता है। सत्य का तो उनमें नाम भी नहीं होता' - “प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुरा:। न शौचं नापिचाचारो न सत्यं तेषु विद्यते।” आठवें के शुरू में भी कहा है कि 'वे जगत को बेबुनियाद और इसीलिए निष्प्रयोजन मानते हैं' - "असत्यमप्रतिष्ठन्ते जगदाहु:।" और जब ऐसी बात है तो फिर ईश्वर की क्या जरूरत? वह तो तभी होती जब यह संसार किसी खास मकसद या उद्देश्य को लेकर बनाया गया होता - बना होता। इसीलिए वे कहते हैं कि ईश्वर की कोई जरूरत हई नहीं।

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