हमें एक ही बात और कह के उपसंहार करना है। गीता के प्राचीन टीकाकारों में किसी-किसी ने गीता के वर्णन को केवल आलंकारिक मान के अर्जुन, कृष्ण आदि को ऐतिहासिक पुरुषों की जगह कुछ और ही माना है। उपदेश और उपदेश्य - गुरु तथा शिष्य - आदि को ही कृष्ण, अर्जुन आदि का रूप उनने दिया है और इस तरह अपनी कल्पना का महल उसी नींव पर खड़ा किया है। मगर हमें उससे यह पता नहीं चल सका था कि ऐसा करके वे लोग सचमुच महाभारत, गीता, उस युद्ध और कौरव-पांडव आदि को ऐतिहासिक पदार्थ नहीं मानते। क्योंकि इस बात की झलक उनकी टीकाओं में पाई नहीं जाती।

परंतु कुछ आधुनिक लोगों ने यह कह के गीता को ही ऐतिहासिकता से हटाना चाहा है कि प्राय: बीस लाख फौजों - क्योंकि 18 अक्षौहिणियाँ वहाँ मानी जाती हैं, और एक अक्षौहिणी में प्राय: एक लाख आदमी के अलावे घोड़े, हाथी, तोप आदि के होते थे - के बीच में, जब वह प्रहार करने ही को थीं, यह गीतोपदेश असंभव था। इसके लिए समय कहाँ था? इसीलिए कवि ने पीछे से कृष्ण और अर्जुन के नाम पर उसे रच के महाभारत में घुसेड़ दिया है।

मगर यदि वह जरा भी सोचें तो पता चले कि इस गीतोपदेश के लिए दो-चार घंटे की जरूरत न थी। सात सौ श्लोकों का पाठ तेजी से एक घंटे में पूरा हो जाता है। किंतु वहाँ श्लोक बोले गए, सो भी ठहर-ठहर के, यह बात तो है नहीं। कृष्ण ने अर्जुन को प्रचलित भाषा में उपदेश किया। एक घंटे के लेक्चर को लिखने में पोथा बन जाता है। गीतोपदेश में तो कुछ ही मिनटों की या ज्यादे से ज्यादा आधे घंटे की जरूरत थी। विश्वरूप का लेक्चर तो हुआ भी नहीं। वह तो दिखा दिया गया। अर्जुन ऐसा कुंद थोड़े ही था कि समझता न था और बार-बार रगड़-रगड़ के पूछता था। अत: उस मौके पर भी दस-बीस मिनट का समय निकाल लेना कुछ कठिन न था।

फिर भी हमारे ही देश के कुछ महापुरुषों ने जब यह कह दिया कि महाभारत की बातें ऐतिहासिक नहीं, किंतु कविकल्पित हैं, इसलिए गीता का संवाद भी वैसा ही है, तो हमें मर्मांतिक वेदना हुई। केवल हमीं को नहीं। हमारे जैसे कितनों को यह कष्ट हुआ। उसी समय कईयों ने हमसे अनुरोध किया कि आप इसका प्रतिपादन समुचित रूप से करें। वे हमारे गीता-प्रेम को जानते थे। इसी से उनने ऐसा कहा। यदि गीता में किसी का अपना सिद्धांत और उसकी हिंसा-अहिंसा न मिले तो इसमें गीता का क्या दोष? वह तो रत्नाकर सागर है। गोते लगाइए तो कुछ मोती मूँगे कभी न कभी उसमें से ऊपर लाइएगा ही। मगर आप जो चाहें सो ही उसमें से लाएँ यह असंभव है, और ऐसा न होने पर रत्नाकर के मूल में आघात करना उचित नहीं। गीता के अपने सिद्धांत हैं - गीताधर्म या एक खास चीज है जो उसी का है, न कि किसी और का।

ऐतिहासिकता की बात यों है। आज से हजारों साल पूर्व कुमारिल भट्ट ने मीमांसा दर्शन की टीका, तंत्रवार्त्तिक में, सदाचार के प्रसंग से अर्जुनादि पांडवों और कृष्ण के कामों पर आक्षेप करके पुन: उसका समर्थन किया है। दूसरे की दृष्टि में हमारे सत्पुरुषों का काम खटका था। इसलिए वे उन्हें सत्पुरुष नहीं मानते थे। कुमारिल ने खटका हटा के सत्पुरुष करार दिया और कृष्ण का ननिहाल पांडवों के यहाँ माना।

ब्राह्मणग्रंथों और उपनिषदों - खासकर छांदोग्य बृहदारण्यक आदि - में बीसियों बार कुरुक्षेत्र और कुरुदेश का जिक्र आया है और वहाँ अकाल एवं पाला-पत्थर की बात लिखी गई है। कुरुक्षेत्र का कुरु तो पांडवों तथा कौरवों का पूर्वज ही था। हस्ती भी उनका पूर्वज था। इसी से हस्तिनापुर नाम और स्थान पाए जाते हैं। कुरुक्षेत्र के युद्ध की स्मृति अभी तक वहाँ पाई जाती है और स्थान याद किए जाते हैं। छांदोग्य उपनिषद के चौथे अध्याधय के 17वें खंड में देवकीपुत्र कृष्ण का उल्लेख है और ये थे पांडवों के नातेदार यह अभी कहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि भीष्म के मरण के समय माघ में कृत्तिका नक्षत्र का सूर्य लिखा मान के और तैत्तिरीय आदि संहिताओं में भी यही देख के महाभारत के युद्ध का समय ईसा से पूर्व 1400 से लेकर 2500 साल के बीच में गणित के आधार पर ठीक किया गया है। तिलक ने ओरायन में इसका बड़ा प्रामाणिक विवेचन किया है। इसके सिवाय बीसियों भारतीय तथा पाश्चात्य देशीय पुरातत्वज्ञों ने भी यह बात मानी है। तिलक ने गीतारहस्य में साफ ही लिखा है कि 'सभी लोग मानते हैं कि श्रीकृष्ण तथा पांडवों के ऐतिहासिक पुरुष होने में कोई संदेह नहीं है,' 'चिंतामणिराव वैद्य ने प्रतिपादन किया है कि श्रीकृष्ण, यादव, पांडव तथा भारतीय युद्ध का एक ही काल है।' 'फिर निराधार बात क्यों कही जाए? तब तो रामायण आदि हमारा सभी इतिहास इसी तरह खत्म होगा। महाभारत पुस्तक को पुराण न कह के इतिहास कहते हैं और पंचमवेद भी। उपनिषद में भी ऐसा ही कहा है। तो क्या अब उसे निरा उपन्यास माना जाए।

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