असल बात यह है कि प्राचीन समय में कुछ ऐसी प्रणाली थी कि हम क्या हैं, यह संसार क्या है और हमारा इसके साथ संबंध क्या है, इन्हीं तीन प्रश्नों को लेकर जो अनेक दर्शनों की विचारधाराएँ हुई थीं और आत्मा-परमात्मा आदि का पता लगा था, या यों कहिए कि इनकी कल्पना की गई थी, उन्हीं में एक व्यावहारिक या अमली धारा ऐसी भी थी कि उसके माननेवाले निरंतर चिंतन में लगे रहते थे। उनकी बात कोई शास्त्रीय-विवेचन की पद्धति न थी। वे तो खुद दिन-रात सोचने-विचारने एवं ध्यान में ही लगे रहते थे। इसीलिए हमने उनकी धारा या प्रणाली को अमली और व्यावहारिक (Practical) कहा है। इस प्रणाली के सैद्धांतिक पहलू पर लिखने-पढ़ने या विवाद करने वाले भी लोग होंगे ही। मगर हमारा उनसे मतलब नहीं है और न गीता का ही है। गीता में तो अमली बात का वह प्रसंग ही है। वही बात वहाँ चल रही है। आगे भी मरण समय की बात आ जाने के कारण अमली या व्यावहारिक चीज की ही आवश्यकता हो जाती है। मरणकाल में कोरे दार्शनिकवादों से सिवाय हानि के कुछ मिलने-जुलनेवाला तो है नहीं।

ऐसे लोगों ने दृश्य - बाहरी - संसार को पहले दो भागों में बाँटा। पहले भाग में रखा अपने शरीर को। अपने शरीर से अर्थ है चिंतन करनेवालों के शरीर से। फिर भी इस प्रकार सभी जीवधारियों के शरीर, या कम से कम मनुष्यों के शरीर इस विभाग में आ जाते हैं। क्योंकि सोचने-विचारने का मौका तो सभी के लिए है। हालाँकि एक आदमी के लिए दूसरों के भी शरीर वैसे ही हैं जैसे अन्न, वस्त्र, पृथिवी, वृक्ष आदि पदार्थ। शरीर के अतिरिक्त शेष पदार्थों को भूत या भौतिक माना गया। पीछे इन भौतिक पदार्थों के दो विभाग कर दिए गए। एक तो ऐसों का जिनमें कोई खास चमत्कार नहीं पाया जाता। इनमें आ गए वृक्ष, पर्वत, नदी, समुद्र, पृथिवी आदि। दूसरा हुआ उन पदार्थों का जिनमें चमत्कार पाया गया। इनमें आए चंद्र, सूर्य, विद्युत आदि। इस प्रकार शरीर, पृथिवी आदि सूर्य प्रभृति, इन तीन विभागों में दृश्य संसार को बाँट दिया गया। शुरू में तो शरीर के सिवाय आत्मा, स्व, या निज नाम की और चीज का पता था नहीं। इसलिए शरीर को ही आत्मा भी कहते थे। पृथिवी आदि स्थूल पदार्थों को, जिनमें चमत्कार या दिव्य-शक्ति नहीं देखी गई, भूत कहने लगे। भूत का अर्थ है ठोस। इन्हें छू के इनका ठोसपन जान सकते थे। मगर जो आदमी की पहुँच के बाहर के सूर्य, चंद्र, विद्युत्, आदि पदार्थ थे उन्हें देवता, देव या दिव्य कहते थे। इनके ठोसपन का पता तो लगा सकते न थे। ये चीजें आकाश में ही नजर आती हैं। इसलिए आकाश को भी दिव् या द्यु कहते थे। वह ठोस भी तो नहीं है। जिस स्वर्ग नामक स्थान में इन दिव्य पदार्थों का निवास माना गया वह भी दिव् या द्यु कहा जाने लगा।

इस प्रकार आत्म या आत्मा, भूत और देव या देवता इन - तीन - विभागों के हो जाने के बाद सोचने-विचारने, चिंतन या ध्यान की प्रक्रिया आगे बढ़ी। आगे चल के शरीर के विश्लेषण करने पर इंद्रिय प्राण, बुद्धि आदि को शरीर से स्वतंत्र स्वीकार करना पड़ा। भौतिक शरीर को छोड़ देने के बाद भी इंद्रिय, प्राणादि रहते हैं। तभी तो जन्म, मरण, पुनर्जन्म आदि की बात मानी जाती है। यदि ये अलग न होते तो कौन जाता, कौन आता और किसका जन्म बार-बार होता? फलत: आत्मा या शरीर में रहने के कारण ही इंद्रियादि को अध्यात्म कहा गया। उपनिषदों में यही बात रह-रह के लिखी पाई जाती है। पाणिनीय व्याकरण के अव्ययीभाव समास के नियमानुसार यही अर्थ भी अध्यात्म शब्द का है कि आत्मा में रहने वाला। 'अधि' को अव्यय कहते हैं। उसी का आत्म शब्द के साथ समास हो के अध्यात्म बना है। फिर कालांतर में जब अंवेषण और भी आगे बढ़ा तो शरीर, इंद्रियादि से अलग आत्मा नामक एक अजर-अमर पदार्थ की कल्पना हुई। उसकी भी जानकारी तो शरीर में ही होती है। उसे भी इसीलिए अध्यात्म कह दिया। उसी आत्मा को जब परमात्मा मान लिया और इसका विवेचन भी किया गया तो सभी विवेचनों को अध्यात्मशास्त्र, आध्यात्मिकशास्त्र या आध्यात्मिक विवेचन नाम दिया गया।

इसी प्रकार भौतिक पदार्थों या भूतों का भी विश्लेषण एवं विवेचन किया गया और उनमें जो रूप, रस, गंध आदि खूबियाँ या विशेषताएँ पाई गईं उन्हें अधिभूत कहा गया। वे भूतों में ही जो पाई गईं। कुछ अंवेषणकर्त्ता यहीं टिक गए और आगे न बढ़े। दूसरे लोग आगे बढ़े और इन भूतों में भी सत्ता, अस्तित्व आदि जैसी चीजों का पता लगाया। इनके बारे में हमने पहले ही बहुत कुछ कहा है। इसी प्रकार देव या देवता कहे जाने जानेवालों की भी जाँच-पड़ताल होती रही। भूतों के अंवेषण होने पर जिन पदार्थों को अधिभूत कहा गया उनके संबंध के विवेक, विचार और मंथन आदि को ही आधिभौतिक नाम दिया गया। इसी तरह देवों या देवताओं में जो भी विभूति, खूबी, चमक, आभा वगैरह जान पड़ी उसे अधिदेव, अधिदैव या अधिदैवत नाम दिया गया। तत्संबंधी चिंतन, ध्यान या विवेचन भी आधिदैवत, आधिदैव या आधिदैविक कहा जाने लगा। पीछे तो लोगों ने अधिभूत और अधिदैव को एक में मिला के सबों के भीतर एक अंतर्यामी पदार्थ को मान लिया, जो सबों को चलाता है, कायम रखता है, व्यवस्थित रखता है। उसी अंतर्यामी को ब्रह्म या परमात्मा कहने लगे। सबसे बड़ा होने के कारण ही उसे ब्रह्म कहना शुरू किया। शरीर के भीतरवाली आत्मा को व्यष्टि मान के ब्रह्म को परमात्मा, बड़ी आत्मा या समष्टि आत्मा कहने की रीति चल पड़ी।

ऊपर हमने जो कुछ लिखा है वह शुरू से लेकर आज तक की स्थिति का संक्षिप्त वर्णन है। शुरू से ही यह हालत तो थी नहीं। यह परिस्थिति तो क्रमिक विकास होते-होते पैदा हो गई है। जब स्वतंत्र रूप से लोगों का चिंतन चलता था तो कोई अध्यात्म-विमर्श में लगे थे, कोई अधिदैव-विचार में और कोई अधिभूत-विवेचन में। यह तो संभव न था कि सभी लोग सभी बातें सोच सकें। तब तो सभी बातें अधूरी ही रह जातीं। कोई भी पूरी न हो पाती, अंत तक पहुँच पाती नहीं। और ज्ञान की वृद्धि के लिए वह अधूरापन सर्वथा अवांछनीय है, त्याज्य है। यही कारण है कि अलग-अलग सोचने वाले अपने-अपने कामों में लीन थे। यही कारण है कि जब तक सब लोग गोष्ठी या परस्पर विमर्श नहीं कर लेते थे तब तक अनेक स्वतंत्र निश्चयों पर पहुँचते थे। यह बात स्वाभाविक थी। श्वेताश्वतर उपनिषद् के पहले ही दो मंत्रों 'ब्रह्मवादिनो वदन्ति, किं कारणं ब्रह्म कुत: स्म जाता:' आदि, तथा 'काल: स्वभावो नियतिर्यदृच्छा' आदि में यही मतभेद और विचारभेद बताया गया है। साथ ही सभी सोचने वालों को ब्रह्मवादी ही कहा है, न कि किसी को भी कमबेश। उसी के छठे अध्याय के पहले मंत्र में भी इसी प्रकार के विचार-विभेद का उल्लेख 'स्वभावमेके कवयो वदन्ति' आदि के द्वारा किया है। वहाँ सबों को कवि या सूक्ष्मदर्शी कहा है। छांदोग्य के छठे अध्याय के दूसरे खंड के पहले ही मंत्र में 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' आदि के जरिए यही विचार विभिन्नता बताई गई है और अगले 'कुतस्तु खलु' मंत्र में इसी का खंडन-मंडन लिखा गया है। फलत: विभिन्न विचारों के प्रवाह होने जरूरी थे।

वैसी हालत में जो परम कल्याण या मोक्ष की आकांक्षा रखता हो उसके दिल में यह बात स्वभावत: उठ सकती है कि कहीं धोखा और गड़बड़ न हो जाए; कहीं ऐसा रास्ता न पकड़ लें कि या तो भटक जाएँ या परेशानी में पड़ जाएँ; कहीं ऐसे मार्ग में न पड़ें जो अंत तक पहुँचने वाला न हो के मुख्य मार्ग से जुटने वाली पगडंडी या छोटी-मोटी सड़क हो; राजमार्ग के अलावा कहीं दूसरे ही मार्ग के पथिक न बन जाएँ; कहीं ऐसा न हो कि मार्ग तो सही हो, मगर उसके लिए जरूरी सामान संपादन करने वाले उपाय या रास्ते छूट जाएँ और सारा मामला अंत में खटाई में पड़ जाए। जो सभी विचारपद्धतियों एवं चिंतनमार्गों को बखूबी नहीं जानते और न उनके लक्ष्य स्थानों का ही पता रखते हैं उनके भीतर ऐसी जिज्ञासा का पैदा होना अनिवार्य है। जिन्हें सभी विचार प्रवाहों का समन्वय या एकीकरण विदित न हो और जो यह समझ सके न हों कि पुष्पदंत के शब्दों में रुचि या प्रवृत्ति के अनुसार अनेक मार्गों को पकड़ने वाले अंत में एक ही लक्ष्य तक - परमात्मा तक - पहुँचते हैं - 'रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथ जुषाम्, नृणामे को गम्यवत्वमसि पयसामर्णव इव,' वे तो घबरा के सवाल करेंगे ही कि 'परमात्मा का ध्यान तो हम करेंगे सही, लेकिन अध्यात्म, अधिदैव, अधिभूत का क्या होगा? उनकी जानकारी हमें कैसे होगी? यदि न हो तो कोई हानि तो नहीं?'

सबसे बड़ी बात यह है कि उस काम में फँस जाने पर कर्मों से तो अलग हो जाना ही होगा। यह तो संभव नहीं कि ध्यान और समाधि भी करें और कर्मों को भी पूरा करें। ऐसी दशा में संसार का एवं समाज का कल्याण कहीं गड़बड़ी में न पड़ जाए यह खयाल भी परेशान करेगा ही। उनका यह काम ऐसे मंगलकारी कर्मों के भीतर तो शायद ही आए। कम से कम इसके बारे में उन्हें संदेह तो होगा ही। फिर काम कैसे चलेगा? और अगर जानकार लोग ही समाज के लिए मंगलकारी कामों को छोड़ के अपने ही मतलब में - अपनी ही मुक्ति के साधन में - फँस जाएँ, तो फिर संसार की तो खुदा ही खैर करे। तब तो संसार पथदर्शन के बिना चौपट ही हो जाएगा। इसके अतिरिक्त यज्ञवाला प्रश्न भी उन्हें परेशान करेगा। जब पहले ही कहा जा चुका है कि 'यज्ञों के बिना तो यहीं खैरियत नहीं होती, परलोक का तो कुछ कहना ही नहीं' - “नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्य: कुरुसत्तम” (4। 31), तो काम कैसे चलेगा? तब तो सब खत्म ही समझिए। यज्ञ के ही बारे में एक बात और भी उठ सकती है। यदि कहा जाए कि यज्ञ तो व्यापक चीज है। अतएव ध्यान और समाधि के समय भी होता ही रहता है, तो सवाल होता है कि यज्ञ में असल लक्ष्य, असल ध्येय कौन है जिसे संतुष्ट किया जाए? कहीं वह कोई दूसरा तो नहीं है। ज्ञान, ध्यान तो शरीर के भीतर ही होता है और यह यदि यज्ञचक्र में आ गया तब तो अच्छी बात है। तब तो बीमारी, दुर्बलता, अशक्ति और मरणावस्था में भी यह हो सकता है। इसलिए तब खासतौर से यह जानना जरूरी हो जाता है कि शरीर के भीतर जब यज्ञ होता है तो उससे किसकी तृप्ति होती है, कौन संतुष्ट होता है? कहीं नास्तिकों की तरह खाओ-पिओ, मौज करो की बात तो नहीं होती और केवल अपना ही संतोष तो नहीं होता? असल में उस यज्ञ से परमात्मा तक पहुँचते हैं या नहीं यही प्रश्न है। इसीलिए देह के भीतर ही अधियज्ञ को जानने की उत्कंठा हुई है। क्योंकि सबसे महत्त्वपूर्ण चीज यही है और सबसे सुलभ भी। मगर यदि इससे इंद्रियादि की ही पुष्टि हुई तो सारा गुड़ गोबर हो जाएगा। इसीलिए सभी प्रश्न किए गए हैं। यह ठीक है कि सातवें अध्याय के अंत में कृष्ण ने कह दिया है कि वह ज्ञान सर्वांगपूर्ण है - इसमें कोई कमी नहीं है; क्योंकि अधिभूत आदि को भी ऐसा पुरुष बखूबी जानता है। लेकिन जब तक अर्जुन को पता न लग जाए कि आखिर ये अधिभूत आदि हैं क्या, तब तक संतोष हो तो कैसे? इसलिए आठवें के शुरू में उसने यही पूछा है, यही प्रश्न किए हैं।

उनके उत्तर भी ठीक वैसे ही हैं जिनसे पूछने वाले को पूरा संतोष हो जाए। मरने के समय भगवान को जानने की जो उत्कंठा दिखाई गई थी उसका संबंध अधियज्ञ से ही है। इसीलिए उसे उसके बाद ही रखा है और उसका उत्तर शेष समूचे अध्याय में दिया गया है। क्योंकि सब प्रश्नों का मतलब चौपट हो जाए, यदि वह बात न हो सके। अर्जुन को यह भी खयाल था कि कृष्ण कहीं अपने आपकी ही भक्ति की बात न करते हों, और इस प्रकार ब्रह्मज्ञान से नाता ही न रह जाने पर कल्याण में बाधा न पड़ जाए। इसीलिए अर्जुन ने पूछा कि आखिर वह ब्रह्म क्या है? आपसे या ईश्वर से अलग है या एक ही चीज? उसका यह भी खयाल था कि कहीं ब्रह्म या परमात्मा भी वैसा ही चंदरोजा न हो जैसी यह दुनिया। तब तो मुक्ति का यत्न ही बेकार हो जाएगा। हिरण्यगर्भ को भी तो ब्रह्मा या ब्रह्म कहते हैं और उसका नाश माना जाता है। यही कारण है कि उस ब्रह्मा से पृथक परम अक्षर या अविनाशी ब्रह्म का निरूपण आगे किया गया है। वहाँ बताया गया है कि क्यों ब्रह्मा का नाश होता है और कैसे, लेकिन अक्षर ब्रह्म का क्यों नहीं?

उत्तर से सभी बातों की पूरी सफाई हो जाती है। परम अक्षर को ब्रह्म कहा है। असल में पंदरहवें अध्याय के 'द्वाविमौ पुरुषौ लोके' (16) श्लोक में जीव को भी अक्षर कहा है। इसीलिए परम आत्मा - परमात्मा - की ही तरह यहाँ परम अक्षर कहने से परमात्मा का ही बोध होता है। नहीं तो गड़बड़ होती।

अध्यात्म को स्वभाव कहा है। ब्रह्म के बाद स्वभाव शब्द आने से इसमें स्व का अर्थ वही ब्रह्म ही है। उसी का भाव या स्वरूप स्वभाव कहा जाता है। अर्थात अध्यात्म, जीव या आत्मा ब्रह्म का ही रूप है। गीता में स्वभाव शब्द कई जगह आया है। अठारहवें अध्याय के 41-44 श्लोकों में कई बार यह शब्द प्रकृति या गुणों के अनुसार दिल-दिमाग की बनावट के ही अर्थ में आया है। उसी अध्याय के 60वें श्लोक वाले का भी वही अर्थ है। पाँचवें अध्याय के 'न कर्त्तृव्यं' (14) श्लोक में जो स्वभाव है उसका अर्थ है सांसारिक पदार्थों या सृष्टि का नियम। मगर जैसे अठारहवें अध्याय के स्वभाव शब्द में स्व का अर्थ है गुण और तदनुसार रचना, उसी तरह पाँचवें अध्याय में स्व का अर्थ है इसके पहले के सांसारिक पदार्थ, जिनका जिक्र उसी श्लोक में हैं। सातवें अध्याय के ही 20वें श्लोक में जो भाव शब्द है उसका अर्थ है पदार्थ या हस्ती-अस्तित्व। ठीक उसी प्रकार इस श्लोक में भी स्वभाव का अर्थ हो जाता है ब्रह्म का भाव, अस्तित्व या रूप। दूसरा अर्थ ठीक नहीं होगा।

कम का जो स्वरूप बताया गया है वह भी व्यापक है। 'भूतभावोद्भवकरो विसर्ग:' यही उसका स्वरूप है। इसका अर्थ है जिससे पदार्थों का अस्तित्व, वृद्धि या उत्पत्ति हो उस त्याग, जुदाई या पार्थक्य को कर्म कहते हैं। यहाँ विसर्ग शब्द और सातवें के 27वें का सर्ग शब्द मिलते-जुलते हैं। संस्कृत के धातुपाठ में जो धातुओं का अर्थ लिखा गया है वहाँ सृज धातु का विसर्ग ही अर्थ लिखा है। पहले कह चुके हैं कि 'तपाम्यमहं वर्षं' (9। 19) श्लोक में उत्सृजामिका जो उत्सर्ग अर्थ है वही विसर्ग का भी है। दोनों में सृज धातु ही है। वर्णमाला में आखिर अक्षर जो स्वरगणना में पाया जाता है उसे भी विसर्ग एवं विसर्जनीय कहते हैं। ब्राह्मणग्रंथों में 'वैसर्जन होम' आता है। वहाँ भी विसर्जन का अर्थ है समाप्ति या खात्मा, या छोड़ देना। स्वरों का अंत होने के कारण ही विसर्ग आखिरी स्वरवर्ण है। वहाँ भी उस सिलसिले का अंत है। मल-मूत्रादि के त्याग या वीर्यपात को भी विसर्ग कहते हैं। सारांश यह है कि जिस चीज के छोड़ने, अलग करने, पूरा करने, प्रयोग करने, त्यागने से सृष्टि की उत्पत्ति, रक्षा, वृद्धि आदि हो सके वही कर्म है। इस प्रकार इस व्यापक अर्थ में ज्ञान, ध्यान, समाधि वगैरह का भी समावेश हो जाता है और इस तरह प्रश्नकर्त्ता का शक जाता रहता है। यह कम कल्याणकारी चीजें नहीं हैं। गीता का कर्म कोई पारिभाषिक या खास ढंग की चीज नहीं है, यही आशय है।

'अधिभूतं क्षरोभाव:' का अर्थ है कि पदार्थों का जो क्षर स्वरूप है, या यों कहिए कि उनकी विनाशिता है वही अधिभूत है। भाव शब्द तीन बार इतनी ही दूर में आ गया है और तीनों का एक ही अर्थ है सत्ता, अस्तित्व या रूप। पहले कह चुके हैं कि आखिर दृश्यजगत या भौतिक पदार्थों में जो विनाशिता है वह तो अजर-अमर है। यदि वह ऐसी न हो और सदा रहने वाली न हो तो पदार्थ ही अविनाशी बन जाएँ। इसीलिए वही उनका असली रूप है, स्व है, आत्मा है। आत्मा को तो गीता ने बार-बार अविनाशी कहा है। इस संबंध में बृहदारण्यक का वचन भी पहले ही लिखा जा चुका है। इस प्रकार अधिभूत भी आत्मा या परमात्मा से जुदा नहीं है। मगर उसे जिस ढंग से कहा है उसमें सुंदर दार्शनिकता पाई जाती है। इसी अध्याय के 20वें श्लोक में भाव शब्द जिस अर्थ में आया है वही अर्थ यहाँ भी है - पदार्थों का असल मूल वही है जिसे आत्मा या परमात्मा कहते हैं।

'पुरुषश्चाधिदैवतम्' का अर्थ है कि 'पुरुष ही अधिदैवत है।' गीता के 'द्वाविमौ पुरुषौ' श्लोक की बात कह चुके हैं। उसमें पुरुष आता है। उसी में 'क्षर: सर्वाणि भूतानि' भी लिखा है, जिससे अधिभूत का अर्थ साफ होता है। मगर प्रकृति तथा जीव दोनों को ही पुरुष कहा गया है, यह बात याद रखने की है। उससे आगे के 17वें श्लोक में 'उत्तम: पुरुष:' शब्दों में परमात्मा को उत्तम पुरुष या दोनों से ही पृथक बताया है और 18वें में उसी को पुरुषोत्तम भी कहा है। इससे सिद्ध हो जाता है कि आधिदैवत भी वही परमात्मा या पुरुष है और है वह सभी का स्वरूप 'वासुदेव: सर्वम्।'

अंत में 'अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे' के द्वारा यह कह दिया है कि मैं - परमात्मा - ही सभी शरीरों के भीतर अधियज्ञ हूँ। जो दिन-रात, श्वास-प्रश्वास, खानपान, निद्रा, बोलचाल, विचार, ध्यान आदि के रूप में 'यत् करोऽषि यदश्नासि' (9। 27) के अनुसार अखंड यज्ञ जारी है उससे भगवान की ही पूजा हो रही है, यही इसका आशय है। यह पूजा सुलभ और सुकर है। फलत: चिंता का अवसर रही नहीं जाता।

सातवें अध्याय के अंतिम - 29, 30 - श्लोकों में जो कुछ कहा है वह भी हमारे पूर्व के बताए इसी अर्थ का पोषक है। उन दोनों श्लोकों का पूरा विचार किया जाए तो यही अभिप्राय व्यक्त होता है कि जन्म-मरण आदि के संकटों से छुटकारा सदा के लिए पा जाने के विचार से जो लोग भगवान में ही रमते और यही काम करते हैं वह उस पूर्ण ब्रह्म को भी जानते हैं, अध्यात्म को भी और सभी कर्मों को भी। अधिभूत, अधिदैव तथा अधियज्ञ के रूप में भी भगवान को वही जानते हैं। इसीलिए पूर्ण योगी होने के कारण मरण समय में भी परमात्मा को साक्षात जान लेते हैं। दूसरे शब्दों में इसका आशय यह है कि जो लोग अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ, अध्यात्म, ब्रह्म और कर्म को जानते हैं वही परमात्मा को अंत में भी जानते हैं। वही जरामरण - जन्ममरण - से छुटकारा पाने का यत्न भी ठीक-ठीक करते हैं। हर हालत में जानने से ही मतलब है; न कि शास्त्री य पद्धति एवं वादविवाद से। ये सभी एक ही चीज हैं यह इससे साफ हो जाता है। 'एकै साधे सब सधै' भी चरितार्थ हो जाता है। इसलिए भगवान में रमनेवाले के लिए चिंता की कोई गुंजाइश रह जाती नहीं।

एक ही बात और कहके इस लंबे विवेचन को पूरा करेंगे। जिस सातवें अध्याय में अध्यात्म आदि आए हैं और आठवें तक चले गए हैं उसके शुरू का ही श्लोक ऐसा है, 'ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषत:। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोन्यज्ज्ञातव्यम विशिष्यते' (7। 2)। इसका भाव यह है कि 'हम तुम्हें ज्ञान-विज्ञान दोनों ही बताएँगे, सो भी पूरा-पूरा। उसके बाद तो कुछ जानना बाकी रही नहीं जाएगा।' इससे यह स्पष्ट होता है कि आगे जो कुछ कहा गया है वह ज्ञान और विज्ञान के ही सिलसिले में विस्तार के साथ आया है। ज्ञान और विज्ञान की बात यहीं से शुरू हो के सत्रहवें अध्याय के अंत तक पाई जाती है। अठारहवें में भी बहुत कुछ वही है। सातवें अध्याय का तो नाम ही है ज्ञान-विज्ञान योग। नवें अध्याय के पहले श्लोक में भी 'ज्ञानं विज्ञानसहितं' आया ही है। इस पर आगे और भी लिखेंगे। लेकिन ज्ञान-विज्ञान की बात चालू है यह तो मानना ही होगा। उसी प्रसंग से अध्यात्म आदि आए हैं यह भी निर्विवाद है।

और यह ज्ञान एवं विज्ञान है क्या चीज? ज्ञान तो है जानकारी या अनुभव और उसमें जब विशेषता या खूबी आ जाए तो वह हुआ विज्ञान। किसी ने हमें कह दिया या हमने कहीं पढ़ लिया कि सफेद और पीले रंगों को मिला के लाल तैयार करते हैं। यही हुआ लाल रंग के बारे में ज्ञान। इसे सामान्य जानकारी भी कह सकते हैं। मगर जब हमने खुद दोनों रंगों को मिला के लाल रंग तैयार कर लिया और उसकी पूरी जानकारी हासिल कर ली, तो वही हो गया विज्ञान। दूसरा दृष्टांत लीजिए। कहीं पढ़ लिया या जान लिया कि हाइड्रोजन और ऑक्सीजन नामक हवाओं को विभिन्न अनुपात में मिलाने से ही जल तैयार हो जाता है। यह ज्ञान हुआ। और जब किसी प्रयोगशाला में जा के हमने इसका प्रयोग खुद करके देख लिया या दूसरों से प्रयोग करा लिया तो वही विज्ञान हुआ। विज्ञान से वस्तु के रगरेशे की जानकारी हो जाती है।

प्रकृत में भी यही बात है। यों ही आत्मा-परमात्मा या जीव-ब्रह्म और संसार की बात कह देने से काम नहीं चलता। वह बात दिल में बैठ पाती नहीं। यदि बैठाना है तो उसका प्रयोग करके देखना होगा - यह देखना होगा कि किस पदार्थ से कौन कैसे बनता है, रहता है, खत्म होता है। यदि परमात्मा ही सब कुछ है तो कैसे, इसका विश्लेषण करना होगा। जब तक ब्योरेवार सभी चीजों को अलग-अलग करके न देखेंगे तब तक हमारा ज्ञान पक्का न होगा, विज्ञान न होगा, दिल में बैठेगा नहीं। फलत: उससे कल्याण न होगा। इसीलिए अध्यात्म, अधिभूत आदि विभिन्न रूपों में आत्मा या परमात्मा का जानना जरूरी हो जाता है और इसीलिए उसका उल्लेख आया है। बिना इसके जिज्ञासुओं को संतोष कैसे हो?

इसीलिए सातवें के आखिरी - 30वें - श्लोक का जो लोग ऐसा अर्थ करते हैं कि भगवान के ज्ञान के साथ ही अधिभूत आदि का पृथक ज्ञान होना चाहिए, यही गीता की मंशा है, वह भूलते हैं। वहाँ तो सबों को परमात्म स्वरूप ही - 'वासुदेव: सर्वमिति' - जानना है। ब्रह्म तथा अधियज्ञ को तो परमात्म-रूप साफ ही कहा है। जीव - अध्यात्म - भी तो वही है। हाँ, कर्म शायद अलग हो। मगर वह तो व्यापक है। फलत: अंततोगत्वा वह भी जुदा नहीं है।

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