यदि ब्रह्म या परमात्मा में असली प्रेम करना है जो सोलह आना हो और निर्बाध हो, अखंड हो, एकरस हो, निरंतर हो, अविच्छिन्न हो, तो आत्मा और ब्रह्म के बीच का भेद मिटाना ही होगा - उसे जरा भी न रहने देकर दोनों को एक करना ही होगा। यदि सच्ची भक्ति चाहते हैं तो दोनों को - आशिक और माशूक को - एक करना ही होगा। यही असली भक्ति है और यही असली अद्वैतज्ञान भी है। इसीलिए गीता ने भक्तों के चार भेद गिनाते हुए अद्वैतज्ञानी को भी न सिर्फ भक्त कहा है, किंतु भगवान की अपनी आत्मा ही कह दिया है - अपना रूप ही कह दिया है, - 'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्' (7। 18)। जरा सुनिए, गीता क्या कहती है। क्योंकि पूरी बात न सुनने में मजा नहीं आएगा। गीता का कहना है कि, 'चार प्रकार के सुकृती - पुण्यात्मा - लोग मुझमें - भगवान में - मन लगाते, प्रेम करते हैं, वे हैं दुखिया या कष्ट में पड़े हुए, ज्ञान की इच्छावाले, धन-संपत्ति चाहने वाले और ज्ञानी। इन चारों में ज्ञानी तो बराबर ही मुझी में लगा रहता है। कारण, उसकी नजरों में तो दूसरा कोई हई नहीं। इसीलिए वह सभी से श्रेष्ठ है। क्योंकि वह मेरा अत्यंत प्यारा है और मैं भी उसका वैसा ही हूँ। यों तो सभी अच्छे ही हैं; मगर ज्ञानी तो मेरी आत्मा ही है न? मुझसे बढ़ के किसी और पदार्थ को वह समझता ही नहीं। इसीलिए निरंतर मुझी में लगा हुआ मस्त रहता है' - "चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन। आर्त्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी न भरतर्षभ। तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते। प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रिय: उदारा: सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्। आस्थित: सहियुक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्" (7। 16-18)

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