ओहदे से मदहे-नाज़ के बाहर न आ सका
गर इक अदा हो तो उसे अपनी क़ज़ा कहूँ

हल्क़े हैं चश्म-हा-ए-कुशादा ब-सू-ए-दिल
हर तार-ए-ज़ुल्फ़ को निगह-ए-सुर्मा-सा कहूँ

मैं और सद-हज़ार नवा-ए-जिगर-ख़राश
तू और एक वो ना-शुनीदन कि क्या कहूँ

ज़ालिम मिरे गुमाँ से मुझे मुन्फ़इल न चाह
है है ख़ुदा-न-कर्दा तुझे बेवफ़ा कहूँ

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दीवान ए ग़ालिब